।। मुअज्ज़िन-ए-वक्त ।।

ANAND Poem

ANAND Poem

*****

।। मुअज्ज़िन-ए-वक्त ।।

*****
*****

1

मौत की मयकदा से…

मौत की मयकदा से
जब से
वक्त के पैमाने पीयें है
चौदब्रह्मांड अब मयकदा लगता है
हवायें हाला लगती है
आसमान आईस की प्लेट
मेरे पैमाने में मैने उसके
टुकडे डाले।
न जाने क्यूं एक आग सी लगी
सवाल उठा है,
कैसे रहेते होंगे
सितारे?

*****

2

वक्त की वादियों में…!

उसने कभी नहीं उलझाया
न मुज से कोई कहानी पूछी

सुलझाया करती थी
मेरे सवाल
अपनी बैशाखी भरी
आंखो से

वक्त की वादियों में
मौत की मुखबीरी से
उसने छूपा भी लिया था
मुज को

लगता था उनकी आंखो में
एक रज्म़ चल रही थी
वो अपने आप से थी, मुज से या मौत से?
न उन्हे गरज़ थी
न मुजे पता था
ये सवाल रास्ता बन गया
मैं चलता गया
वो कहानी कहती रही…!

*****

3

हम दोनो

निःशब्द के अंधेरे में
एक परछायीं
पीघली पीघली सी

मैने मना किया था
फिर भी
मेरी आंखे बन गई
झील सी

उसने कहा थाः
कहकशां में मिलेंगे
वक्तने वादा तोड दिया
मौत ने अंगडाई ली
रूहानी रूख़सतने
मेरी जिंदगी से सगाई की

रेंजा रेंजा आसमा
उन से भी रेंजा हो गये
हम दोनो
परछायी नहीं परदाई थी
पीघलाई हुई
शरामाई सी…!

*****

4

उफ्क़ के उस पार…

न जाने क्युं सुबह के वक्त
उफ्क़ के उस पार
वक्त सी समंदर लहेरें
मरे मौत से टकराती है

वो कहती थीः
जब हवा भी रूक्ष लगने लगे
न धोखा करो कभी अपनो से

में सुनाया करता था
निंद का एक गीत
वो मुजे सुलाया करती थी
अपनी सरगोश से

*****

5

आखरी सुब्ह के वक्त…!

अभी कुछ साल पहले की ही बात है
दो कहानीयों के बीच
एक वक्त खो गया था…
मौत ने उसे अपनी आगोश में ले लिया था।

उसके कानों के झूमकें..
हमने लगायें पौधे के पास पडे है
दो पहर की धूप में
खयालों की निंद में
ख्वाबों के तालाबों की नमी मीट्टी से
उस पौधे को सिंचा था!

उसी पौधे की शाख से
वक्तभरे पत्ते जब बीखर ने लगे थे।
साँसे तेज हो गयी थी,
आंखो का चित्कार
उसने मुड के देखा था।

उफ़्क के किनारे सुरज सा
रक्तिम बूंद…
हमारी सरगोशी बन रहा था,
हमारी आखरी सुब्ह के वक्त…!

दो कहानी के बीच का वक्त
फिर चलने लगा।
नये शहर में
एक रात में,
तिलमिलाती हवा में,
फिर पौंधें को बोंने की कोशिश की
पर
वक्त से भरे पत्ते फिर गीरने लगे,
मौत से लडता रहा पूरी रात…
वक्त मेरी सरगोशी बन रहा था,
मेरी आखरी सुब्ह के वक्त।

*****

– आनन्द ठाकर
thakaranand88@gmail.com

About aKshArAnANd

સામાય ધસી જઈએ, આઘાય ખસી જઈએ... હોવું ય હવે ઉત્સવ આકંઠ શ્વસી લઈએ....રેતાળ કીનારા પર હેતાળ હસી લઈએ..... મૃત્યુ, જીવન, ઉત્સવ, પ્રેમ, કોમ્પ્યુટર, દોસ્તી પુસ્તક આ બધાને મળવા માટે ધરતી પર ફરવાનું બહાનું મળે તો તે ખરેખર લિજ્જતની વાત છે.....
This entry was posted in અભરખો.... Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s